मां छिन्नमस्ता का अद्भुत रूप, धड़ से अलग है सिर और पीती हैं अपना ही रक्त; जानें रहस्य

 

मां छिन्नमस्ता को देवी दुर्गा के अत्यंत उग्र और रहस्यमयी स्वरूपों में से एक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वे दस महाविद्याओं में छठी महाविद्या हैं। देवी का यह स्वरूप जितना अद्भुत है, उतना ही रहस्यों से भी भरा हुआ है।

मां छिन्नमस्ता के स्वरूप में उनका सिर धड़ से अलग दिखाई देता है। एक हाथ में वे अपना कटा हुआ सिर धारण करती हैं, जबकि दूसरे हाथ में तलवार होती है। देवी के गले में मुंडमाला सुशोभित रहती है। उनके दोनों ओर उनकी सहचरियां डाकिनी और शाकिनी मौजूद रहती हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवी अपने शरीर से निकलने वाली रक्त की धाराओं से डाकिनी और शाकिनी की भूख शांत करती हैं। रक्त की एक धारा स्वयं देवी के मुख में भी जाती हुई दिखाई देती है। मां के इस अद्भुत स्वरूप को देखकर अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर देवी को अपना सिर काटने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसके पीछे एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा बताई जाती है।

जब सहचरियों की भूख मिटाने के लिए देवी ने किया आत्मबलिदान

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार मां दुर्गा अपनी दो सहचरियों डाकिनी और शाकिनी के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने के लिए गई थीं। स्नान करने के बाद दोनों सहचरियों को अचानक बहुत तेज भूख लगने लगी। उनकी भूख इतनी बढ़ गई कि उनके शरीर का रंग तक काला पड़ने लगा।

अपनी सहचरियों की ऐसी स्थिति देखकर माता दुर्गा चिंतित हो उठीं। डाकिनी और शाकिनी ने माता से भोजन की मांग की। देवी ने उन्हें कुछ समय प्रतीक्षा करने के लिए कहा, लेकिन उनकी भूख लगातार बढ़ती जा रही थी।

कथा के अनुसार, जब दोनों सहचरियों की स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई तो उन्होंने माता से अपनी भूख शांत करने की प्रार्थना की। उन्होंने माता से कहा कि जिस तरह एक मां अपने बच्चों की भूख और पीड़ा को देखकर तुरंत उनकी सहायता करती है, उसी तरह वे भी उनकी रक्षा करें और उनकी भूख शांत करें।

इसके बाद देवी ने अपनी सहचरियों की पीड़ा को देखते हुए एक ऐसा कदम उठाया, जिसके कारण उनका यह अद्भुत और रहस्यमयी स्वरूप सामने आया। धार्मिक मान्यताओं में इसी घटना को मां छिन्नमस्ता के प्राकट्य से जोड़कर देखा जाता है।

सहचरियों की भूख मिटाने के लिए देवी ने किया अपना शीश अर्पित

पौराणिक कथा के अनुसार, डाकिनी और शाकिनी की प्रार्थना सुनकर मां दुर्गा का हृदय करुणा से भर उठा। अपनी सहचरियों की पीड़ा देखकर देवी ने अपनी तलवार से स्वयं का सिर काट दिया। जैसे ही उनका सिर धड़ से अलग हुआ, वह उनके बाएं हाथ में आ गया और उनके शरीर से रक्त की तीन धाराएं निकलने लगीं।

मान्यता है कि रक्त की पहली दो धाराएं देवी की दोनों सहचरियों डाकिनी और शाकिनी के मुख में गईं। इसे पीने के बाद उनकी भूख शांत हो गई। वहीं, रक्त की तीसरी धारा देवी के कटे हुए सिर के मुख में पहुंची और उन्होंने स्वयं अपने रक्त का पान किया। इसी अद्भुत और महान त्याग के कारण देवी को ‘छिन्नमस्ता’ नाम से जाना जाने लगा।

 कामदेव और रति के ऊपर क्यों खड़ी दिखाई देती हैं मां छिन्नमस्ता?

मां छिन्नमस्ता के स्वरूप में एक और महत्वपूर्ण प्रतीक देखने को मिलता है। धार्मिक चित्रण में देवी को अक्सर कामदेव और रति के ऊपर खड़ा हुआ दिखाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ है।

मान्यता है कि मनुष्य को सांसारिक इच्छाओं, कामना, वासना और मोह-माया से ऊपर उठकर ही उच्च आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। मां छिन्नमस्ता का यह स्वरूप इसी बात का प्रतीक माना जाता है कि आत्मज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति के लिए भौतिक इच्छाओं पर नियंत्रण जरूरी है।

मां छिन्नमस्ता से जुड़ी एक और पौराणिक कथा

मां छिन्नमस्ता के स्वरूप को लेकर एक अन्य पौराणिक कथा भी प्रचलित है। इसके अनुसार, प्राचीन समय में जब राक्षसों का अत्याचार बढ़ गया और देवता परेशान हो उठे, तब माता पार्वती ने उग्र रूप धारण किया। इस स्वरूप में उन्होंने राक्षसों का संहार करना शुरू कर दिया।

कथा में बताया जाता है कि देवी के इस विकराल रूप को देखकर चारों ओर भय का माहौल बन गया। स्थिति को देखकर देवता भगवान शिव की शरण में पहुंचे और उनसे देवी को शांत करने का अनुरोध किया।

देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान शिव मां छिन्नमस्ता के पास पहुंचे। मान्यता के अनुसार, उस समय देवी ने भगवान शिव से कहा कि उनकी भूख शांत नहीं हो रही है और उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे अपनी भूख कैसे मिटाएं।

इसके बाद भगवान शिव ने उन्हें अपना ही सिर काटकर रक्त का पान करने का उपाय बताया। कथा के अनुसार, देवी ने तुरंत अपनी तलवार से अपना सिर अलग कर लिया और उसे अपने बाएं हाथ में धारण कर लिया।

इसके बाद उनके शरीर से रक्त की तीन धाराएं निकलीं। इनमें से दो धाराएं देवी की दोनों ओर खड़ी डाकिनी और शाकिनी के मुख में गईं, जबकि तीसरी धारा मां के अपने मुख में पहुंची। इस प्रकार देवी और उनकी दोनों सहचरियों की भूख शांत हुई।

धार्मिक मान्यताओं में मां छिन्नमस्ता का यह स्वरूप आत्मबलिदान, त्याग और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, इन कथाओं का आधार धार्मिक और पौराणिक मान्यताएं हैं।

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