फिल्म एक ऐसे संवेदनशील विषय को उठाती है, जो आज के डिजिटल दौर में बेहद प्रासंगिक है। सोशल मीडिया, चैट्स और स्क्रीनशॉट्स के इस समय में एक छोटा सा मैसेज भी किसी की पूरी जिंदगी बदल सकता है। कहानी इसी डरावनी सच्चाई को सामने लाती है कि किस तरह कानून का गलत इस्तेमाल बेगुनाह लोगों को भी मुश्किलों में डाल सकता है।
फिल्म का प्रभाव इतना गहरा है कि इसे देखने के बाद दर्शक किसी को भी मैसेज भेजने से पहले दो बार सोचने पर मजबूर हो सकते हैं। अनुराग कश्यप ने इस बार डर को एक नए अंदाज में पेश किया है, जो किसी हॉरर फिल्म का नहीं बल्कि हमारे आसपास मौजूद वास्तविक परिस्थितियों का डर है।
पिछले साल टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित इस फिल्म को दर्शकों और समीक्षकों से जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली थी। फिल्म देखने वाले कई लोग इसकी कहानी और प्रस्तुति से हैरान रह गए थे।
अब यह फिल्म इस शुक्रवार सिनेमाघरों में रिलीज होने जा रही है। आखिर यह फिल्म क्यों देखनी चाहिए और क्या इसे खास बनाता है, जानिए हमारे पूरे रिव्यू में।
फिल्म की कहानी समीर मेहरा के इर्द-गिर्द घूमती है, जो फिल्म इंडस्ट्री में अपना करियर बनाने का सपना देख रहा है। संघर्ष से भरी जिंदगी जी रहे समीर अकेले रहते हैं और अपनी मंजिल की तलाश में लगातार कोशिश कर रहे हैं। इसी दौरान उनकी जिंदगी में कई रिश्ते आते-जाते हैं।
कहानी तब नया मोड़ लेती है जब समीर की मुलाकात एक डेटिंग ऐप के जरिए एक लड़की से होती है। दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ती हैं और एक रोमांटिक रिश्ता शुरू होता है। लेकिन इसके बाद घटनाएं ऐसा मोड़ लेती हैं जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है।
एक दिन अचानक पुलिस समीर को उनके घर से गिरफ्तार कर लेती है और देखते ही देखते उनकी पूरी जिंदगी बदल जाती है। जिस शख्स के सपने आसमान छूने के थे, वह कानूनी और सामाजिक मुश्किलों के ऐसे जाल में फंस जाता है जहां से निकलना आसान नहीं होता।
आखिर समीर के साथ ऐसा क्या हुआ? उस एक मुलाकात ने उसकी जिंदगी कैसे तबाह कर दी? इन सवालों के जवाब जानने के लिए आपको फिल्म सिनेमाघरों में जाकर देखनी होगी।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी कहानी कहने का तरीका है। शुरुआत से ही फिल्म बिना समय गंवाए सीधे अपने मुख्य मुद्दे पर आ जाती है और दर्शकों को कहानी के साथ बांधे रखती है। यह ऐसी फिल्म है जो आपको डराती जरूर है, लेकिन किसी हॉरर एलिमेंट की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि यह उन परिस्थितियों को सामने लाती है जो किसी भी आम इंसान के साथ घट सकती हैं।
थाने में समीर मेहरा और पुलिस अधिकारियों के बीच होने वाला लंबा संवाद फिल्म के सबसे प्रभावशाली दृश्यों में से एक है। वहीं जेल के भीतर की जिंदगी और कैदियों के साथ होने वाले व्यवहार को जिस वास्तविकता के साथ दिखाया गया है, वह दर्शकों को असहज और बेचैन कर देता है।
हालांकि इंटरवल से ठीक पहले और इंटरवल के बाद कुछ समय के लिए फिल्म की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ती नजर आती है, लेकिन इसके बाद कहानी जिस तरह से आगे बढ़ती है, वह दर्शकों को पूरी तरह झकझोर देती है। फिल्म का दूसरा भाग ज्यादा तीखा, भावनात्मक और प्रभावशाली बनकर सामने आता है।
शुरुआत में ऐसा महसूस होता है कि सपना पब्बी के किरदार का पर्याप्त उपयोग नहीं किया गया है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, उनका किरदार पूरी कहानी की दिशा बदल देता है। उनके लगाए गए आरोप ही समीर की जिंदगी में आए तूफान की वजह बनते हैं और यहीं से फिल्म एक नए मोड़ पर पहुंच जाती है।
फिल्म का क्लाइमैक्स कई सवाल खड़े करता है और दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देता है कि डिजिटल दौर में किसी व्यक्ति की जिंदगी कितनी आसानी से प्रभावित हो सकती है। सोशल मीडिया, डेटिंग ऐप्स और ऑनलाइन बातचीत के बढ़ते चलन के बीच फिल्म का विषय बेहद प्रासंगिक और रिलेटेबल महसूस होता है, जो इसे सिर्फ एक मनोरंजक फिल्म नहीं बल्कि एक जरूरी सामाजिक टिप्पणी भी बनाता है।