चारधाम यात्रा के दौरान उत्तरी हरिद्वार के गंगा घाट श्रद्धालुओं के लिए गंभीर खतरे का कारण बनते जा रहे हैं। हरकी पैड़ी पर बढ़ती भीड़ से बचने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उत्तरी हरिद्वार के घाटों की ओर रुख कर रहे हैं, लेकिन वहां पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था का अभाव चिंता का विषय बना हुआ है।
इन घाटों पर गंगा की मुख्य धारा बहने के कारण पानी की गहराई और बहाव दोनों काफी अधिक हैं। इसके बावजूद कई श्रद्धालु चेतावनी बोर्डों और निर्धारित सुरक्षा सीमाओं की अनदेखी कर आगे बढ़ जाते हैं। कुछ लोग फोटो और सेल्फी लेने के लिए तो कुछ रोमांच की तलाश में तेज बहाव वाले क्षेत्रों तक पहुंच जाते हैं, जिससे हादसों का जोखिम बढ़ रहा है।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यात्रा सीजन के पिछले दो महीनों में 10 से अधिक श्रद्धालु डूबने की घटनाओं में अपनी जान गंवा चुके हैं। वहीं बीते एक सप्ताह के भीतर गुजरात और दिल्ली से आए दो श्रद्धालुओं समेत तीन लोगों की गंगा में डूबने से मौत हो चुकी है, जिससे प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठने लगे हैं।
चारधाम यात्रा अपने चरम दौर में पहुंच चुकी है और हरिद्वार में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ रहा है। हरकी पैड़ी से लेकर मध्य हरिद्वार के विभिन्न गंगा घाटों तक श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखी जा रही है। खासकर सप्ताहांत में स्थिति और अधिक व्यस्त हो जाती है, जब शनिवार और रविवार को श्रद्धालुओं तथा पर्यटकों की संख्या सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना बढ़ जाती है।
भीड़भाड़ वाले प्रमुख घाटों से बचने के लिए कई श्रद्धालु और पर्यटक उत्तरी हरिद्वार के विभिन्न गंगा घाटों का रुख करते हैं। जहां हरकी पैड़ी और अन्य प्रमुख घाटों पर जल पुलिस के गोताखोरों की तैनाती रहती है, वहीं उत्तरी हरिद्वार के अधिकांश घाटों पर सुरक्षा व्यवस्था बेहद सीमित है। यहां न तो पर्याप्त निगरानी है और न ही लोगों को खतरनाक क्षेत्रों में जाने से रोकने के प्रभावी इंतजाम हैं। हालांकि कुछ स्थानों पर चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं, लेकिन इसके बावजूद हादसों का सिलसिला थम नहीं रहा है। विशेष रूप से दूसरे राज्यों से आने वाले श्रद्धालु इन घाटों पर दुर्घटनाओं का शिकार हो रहे हैं।
गंगा का जलस्तर कम होने पर कई श्रद्धालु नदी पार कर बीच में बने टापुओं तक पहुंच जाते हैं। लेकिन कई बार अचानक जलस्तर बढ़ने से वे वहीं फंस जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में जल पुलिस और एसडीआरएफ की टीमों को बचाव अभियान चलाकर उन्हें सुरक्षित निकालना पड़ता है। बीते वर्षों में इस तरह की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बाहरी राज्यों से आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों तथा गंगा के बदलते प्रवाह से पूरी तरह परिचित नहीं होते। इसी वजह से वे संभावित खतरों का सही आकलन नहीं कर पाते और कई बार गंभीर हादसों का शिकार हो जाते हैं।