मनोज बाजपेयी की दमदार एक्टिंग, मजबूत कहानी और नेक इरादा—फिल्म में बस एक कमी

 

थिएटर से बाहर निकलते वक्त मन में एक अजीब-सी उलझन रह जाती है। जब कोई फिल्म हमारे देश के इतिहास के बेहद अहम और संवेदनशील अध्याय पर आधारित होती है, तो उससे उम्मीदें भी काफी ऊँची हो जाती हैं। ‘गवर्नर’ भी ऐसी ही एक कहानी को बड़े पर्दे पर लेकर आती है, जिसकी बुनियाद मजबूत और विषय बेहद दिलचस्प है।

निर्देशक चिन्मय मांडलेकर और निर्माता विपुल शाह ने उस घटना को चुना है, जिसने आधुनिक भारत की दिशा को कहीं न कहीं प्रभावित किया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह फिल्म केवल तथ्यों और घटनाओं का एक औपचारिक प्रस्तुतिकरण बनकर रह जाती है, या फिर यह दर्शकों को एक प्रभावशाली सिनेमाई अनुभव भी दे पाती है? इसी बात पर आगे विस्तार से चर्चा करते हैं।

फिल्म की शुरुआत एक ऐसी अनसुनी और अनकही कहानी की ओर ले जाती है, जहां बाहर से सब कुछ सामान्य और शांत नजर आता है, लेकिन अंदर ही अंदर एक बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक तूफान आकार ले रहा होता है। आमतौर पर इस तरह की फिल्मों में शुरुआत से ही घटनाओं को स्पष्ट कर दिया जाता है, लेकिन ‘गवर्नर’ थोड़ा अलग अंदाज अपनाती है।

कहानी अपने रहस्यों को जल्दी उजागर नहीं करती, बल्कि उन्हें परत-दर-परत बेहद धैर्य के साथ सामने लाती है। यह किसी मसाला फिल्म की तरह तेज रफ्तार गानों या एक्शन से शुरुआत नहीं करती, बल्कि एक सरकारी दफ्तर की खामोशी, कागज़ों की सरसराहट और उन फाइलों के बीच छुपे फैसलों से अपना सफर शुरू करती है, जिनका असर पूरे देश के भविष्य पर पड़ सकता है।

धीरे-धीरे फिल्म का माहौल दर्शकों को अपनी ओर खींचने लगता है। यह दिखाया जाता है कि कैसे एक साधारण व्यक्ति अचानक ऐसी जिम्मेदारी वाली कुर्सी पर बैठ जाता है, जहां एक गलत फैसला सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए भारी पड़ सकता है। निर्देशक शुरुआत में ही यह स्पष्ट कर देता है कि यह कहानी किसी एक नायक की नहीं, बल्कि उस पद और उससे जुड़ी जिम्मेदारियों की है।

शुरुआती हिस्सा काफी संतुलित और प्रभावशाली है, जो दर्शकों के मन में आगे की कहानी को लेकर उत्सुकता पैदा करता है कि अब आगे क्या मोड़ आने वाला है।

फिल्म की मुख्य कथा 1991 के उस दौर पर आधारित है, जब भारत विदेशी मुद्रा भंडार के गंभीर संकट से जूझ रहा था और देश के पास आयात-निर्यात जैसे जरूरी कामों को संभालने के लिए भी बहुत सीमित संसाधन बचे थे।

कहानी के केंद्र में ए. रमणन (मनोज बाजपेयी) हैं, जिन्हें अचानक देश के केंद्रीय बैंक यानी आरबीआई का गवर्नर नियुक्त कर दिया जाता है। रमणन का आर्थिक पृष्ठभूमि बहुत मजबूत नहीं है, इसी कारण उनके अपने ही डिप्टी गवर्नर सी. रंगराजन (नौशाद मोहम्मद कुंजू) और सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारी उन पर भरोसा करने में हिचकिचाते हैं।

जैसे ही रमणन पद संभालते हैं, उनके सामने गल्फ वॉर से उपजा एक बड़ा आर्थिक संकट खड़ा हो जाता है। देश के पास केवल कुछ ही हफ्तों का विदेशी मुद्रा भंडार बचता है, और स्थिति तेजी से बिगड़ने लगती है। इसके बाद शुरू होती है एक कठिन दौड़, जिसमें उन्हें अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से बातचीत करनी होती है, विदेशों से कर्ज जुटाना होता है और मजबूरी में देश का सोना तक गिरवी रखने जैसे कठोर फैसले लेने पड़ते हैं।

पटकथा इस पूरे आर्थिक संकट को सरल और समझने योग्य भाषा में प्रस्तुत करने की कोशिश करती है, ताकि आम दर्शक भी उस दौर की गंभीरता को समझ सके। हालांकि जब लगता है कि हालात कुछ संभल रहे हैं, तभी रुपये की गिरती कीमत कहानी में एक नया मोड़ लेकर आती है और तनाव और बढ़ जाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *